कुंडली का ग्यारहवां भाव  

कुंडली का ग्यारहवां भाव आय और लाभ का भाव होता है | इस भाव को त्रिश्दय भाव और उपाचय स्थान भी कहते हैं | काल पुरुष की कुंडली के अनुसार इस भाव में कुंभ राशी होती है जिसके स्वामी शनि हैं | इस राशी में कोई भी ग्रह उच्च या नीच नही होते | चर लग्न ( मेष-कर्क-तुला-मकर ) वालों के लिए यह भाव बाधक स्थान है | चर लग्न वालों के लिए इस भाव के स्वामी को बाधकेश  कहते हैं | यह भाव बड़े भाई का भी है |

परिवार का व्यवसाय इसी भाव से देखा जाता है क्योंकि यह भाव दूसरे भाव से दसवां हैं | दूसरा भाव परिवार और दसवां व्यवसाय का होता है | छोटे भाई का भाग्य इसी भाव से देखा जाता है क्योंकि यह भाव तीसरे भाव से नौवां है | तीसरा  भाव छोटे भाई का और नौवां भाव भाग्य का होता है | माँ कि आयु और मानसिक परेशानियाँ इसी भाव से देखी जाती है | यह भाव चौथे भाव से आठवां है | चौथा भाव माँ का और आठवाँ आयु और मानसिक परेशानियों का होता है | इस भाव से संतान का जीवनसाथी भी देखा जाता है | यह भाव पांचवें भाव से सातवाँ है | पांचवां भाव संतान का और सातवाँ जीवनसाथी का होता है | भावतभावम के अनुसार यह भाव छठे भाव से छठा है इसलिए इस भाव से जातक के कर्ज, शत्रु इत्यादि विस्तार पूर्वक देखे जाते हैं | पत्नी की शिक्षा इसी भाव से देखी जाती है | यह भाव सातवें भाव से पांचवां है | सातवाँ भाव पत्नी का और पांचवां भाव शिक्षा का होता है | इस भाव से पिता जी का छोटा भाई यानि चाचा जी भी देखे जाते हैं | यह भाव नौवें भाव से तीसरा है | नौवां भाव पिता जी का और तीसरा भाव छोटे भाई का होता है | इसी तरह पिता जी का पराक्रम भी इसी भाव से देखा जाता है | जातक के व्यापारिक मित्र, लंबी यात्राएँ, सभी इच्छाओं कि पूर्ति भी इसी भाव से देखी जाती है | भावतभावम के अनुसार यह भाव बारहवें भाव से बारहवां है अर्थात बारहवें भाव से मिलने वाली चीजों को विस्तार पूर्वक इसी भाव से देखा जाता है | परंतु बारहवें भाव से बारहवां होने के कारण इस भाव से बारहवें भाव का नुक्सान भी देखा जाता है | यह सब देश, काल और परिस्थिति के अनुसार ही जातक की कुंडली पर लागू करना चाहिए |