ज्योतिष और कर्मफल

नमस्कार दोस्तों , आज तक हमने स्कूल में ग्रहों के बारे में पढा है और ये जाना है कि वो भ्रमण करते रहते हैं परन्तु ये नहीं जाना कि उनके भ्रमण के कारण हमारी जिंदगी पर क्या प्रभाव पड़ता है | ज्योतिष में हम यही जानते है | ज्योतिष वह ज्ञान है जो ग्रहों की स्थिति एवं उनके भ्रमण और काल और उसका हम सब पर पड़ने वाले प्रभाव को बताता है | प्राचीन समय से ही हमारे ऋषि मुनि इस ज्ञान का प्रयोग करते आ रहे हैं | ज्योतिष वह विज्ञान है जिससे ग्रहों के नियमित रूप से बदलते रहने, व्यक्तियों एवं राष्ट्रों के भाग्य एवं दुर्भाग्य, जलप्रलय, भूकंप, ज्वालामुखी, महामारी, एवं पृथ्वी सम्बन्धी, सांसारिक मामलों में भविष्यवाणी की जाती है | संस्कृत में इसे होरा शास्त्र भी कहते हैं | कुल मिलाकर ज्योतिष  शास्त्र एक दैवज्ञ   विज्ञान है जो आकाश में ग्रहों कि स्थिति बदलने से शारीरिक, मानसिक, एवं आत्मिक स्थिति को सपष्ट करता है |

प्रत्येक मनुष्य की जन्म कुंडली बनाने के लिए हमें तीन चीजों की जरुरत होती है |

१.     जन्म की तारीख

२.     जन्म का समय

३.     जन्म का स्थान

अगर यह तीन जानकारियां सही हैं तो जातक की कुंडली बनायी जा सकती है | इसी जन्म कुंडली के आधार पर मनुष्य के जीवन में होने वाली सारी घटनाओं को देखा जा सकता है | मनुष्य का स्वभाव कैसा होगा, उसमें क्या क्या विशेषताएं होंगी, उसकी आयु का ज्ञान, उसका स्वास्थ्य, संतान, होने वाली दुर्घटनाएं, वितीय स्थिति, विवाह, कष्ट, इत्यादि सभी बातें जानी जा सकती हैं |

ज्योतिष और कर्मफल का सुनिश्चित सिद्धांत

ज्योतिष और कर्मफल का आपसी सम्बन्ध बहुत गहरा है | हम सब जानते है कि हमारी ज़िन्दगी में होने वाली सभी घटनाएँ हमारे पूर्व जन्म के कर्मों के कारण उसके फलस्वरूप ही होती हैं | हम इस जन्म में जो कुछ भी भुगतते हैं, वो हमारे पूर्व जन्म के फलस्वरुप ही होते है | हमारे कर्मों को तीन श्रेणियों में रखा गया है –

    I.     संचित कर्म

   II.     प्रारब्ध

  III.     आगामी कर्म

संचित कर्म – हम न जाने पिछले कई जन्मों से कर्म करते आ रहे हैं | यही कर्म आगे चलकर हमारे दिमाग के एक छोटे से हिस्से में जमा होते रहते हैं, जिसे हम अवचेतन मन कहते है | ये भी कहा जाता है कि ये अवचेतन मन हमारी मृत्यु के बाद हमारी आत्मा के साथ ही हर समय रहता है, और हर नए शरीर में भी साथ ही प्रवेश करता है | ये जन्मों जन्मों के जमा कर्म ही संचित कर्म कहलाते हैं |

प्रारब्ध – संचित कर्मों का फल हम सबको कभी न कभी कहीं न कहीं भुगतना ही पड़ता है | इस जन्म में जो फल हमें भुगतने होते हैं, वही हमारा प्रारब्ध होता है | प्रारब्ध कर्मों के भुगतान के बाद वो कर्म हमारे संचित कर्मों से घट जाते हैं | प्रारब्ध कर्मों के भुगतान के बाद व्यक्ति कि मृत्यु होती है और वो फिर बाकी के संचित कर्मों के भुगतान के लिए नया जन्म लेता है, और इसी तरह जन्म – मृत्यु का खेल चलता रहता है |

आगामी कर्म – जब व्यक्ति प्रारब्ध का फल भुगत रहा होता है तो वह कुछ न कुछ नया कर्म करता रहता है | यही कर्म हमारे आगामी कर्म होते हैं | इनमें से कुछ कर्मों का फल हमें इसी जन्म में मिल जाता है, और जो कर्म बच जाते हैं वो आगे चल कर फिर से संचित हो जाते हैं, और इसी प्रकार संचित – प्रारब्ध – आगामी कर्मों का चक्र चलता रहता है और जन्म – मृत्यु का खेल चलता रहता है |

प्रारब्ध और पुरुषार्थ

जैसा कि हम जान ही चुके हैं कि हर व्यक्ति को अपने कर्मों का फल भुगतना ही पड़ता है | ये फल प्रारब्ध के अनुसार ही होते हैं | परन्तु ऐसा नही है कि अगर किसी व्यक्ति से कोई गलती हो जाये उसकी माफ़ी नहीं होती | अगर हम अपने पूर्व जन्मों के कुछ गलत कर्मों के कारण दुःख भोग रहे हैं तो हम उसकी माफ़ी के लिए प्रार्थना स्वरुप अपने अच्छे कार्यों द्वारा अपने प्रारब्ध के फल को कम भी कर सकते हैं | इसी अच्छे कार्यों को हम पुरुषार्थ कहते हैं | हमारे प्राचीन ऋषि मुनियों ने यहाँ तक भी कहा है कि पुरुषार्थ प्रारब्ध से बड़ा होता है |