कुंडली का चौथा भाव

कुंडली का चौथा भाव सुख स्थान और माँ स्थान भी कहलाता है | काल पुरुष की कुंडली के अनुसार इस भाव की राशि कर्क है | जिसके स्वामी चंद्रमा होते हैं | गुरु इस राशि में उच्च और मंगल नीच के होते हैं | चंद्रमा माता का प्रतिनिधित्व करता है इसलिए इस भाव को माँ स्थान कहा जाता है | इस भाव को केंद्र भाव भी कहा जाता है और यह भाव मोक्ष त्रिकोण का पहला भाव भी है | इस भाव से जातक की भावनाओं का पता चलता है | सभी प्रकार के सुख, वाहन, मकान, जमीन इत्यादि इसी भाव से देखे जाते हैं | इस भाव में चंद्रमा और शुक्र दिग्बली होते हैं | दोनों ग्रहों को इस भाव से ताकत मिलती है और ये अपने अच्छे पारिणाम देते हैं | संतान को होने वाले नुक्सान इसी भाव से देखे जाते हैं क्योंकि यह भाव पांचवें भाव से बारहवां है | पांचवां भाव संतान का और बारहवां भाव नुक्सान का होता है | जातक द्वारा लिए गए कर्जों से एवं अपने शत्रुओं से होते वाले लाभ इसी भाव से देखे जाते हैं क्योंकि यह भाव छठे भाव से ग्यारहवां है | छठे भाव से कर्ज और शत्रु देखे जाते हैं और ग्यारहवें भाव से लाभ देखे जाते हैं | पत्नी का व्यवसाय इसी भाव से देखा जाता है क्योंकि यह भाव सातवें भाव से दसवां हैं | सातवाँ भाव पत्नी का और दसवां भाव व्यवसाय का होता है | पिता जी की आयु एवं मानसिक परेशानियां इसी भाव से देखी जाती हैं क्योंकि यह भाव नोवें भाव से आठवाँ है | नौवां भाव पिता जी का और आठवाँ भाव आयु और मानसिक परेशानियों का होता है | जातक के व्यावसायिक पार्टनर्स इसी भाव से देखे जाते हैं | क्योंकि यह भाव दसवें भाव से सातवाँ है | दसवां भाव व्यवसाय का और सातवाँ भाव पार्टनर्स का होता है | बड़े भाई के कर्ज, शत्रु, नौकरी, बिमारियाँ इत्यादि इसी भाव से देखी जाती हैं क्योंकि यह भाव ग्यारहवें भाव से छठा है | ग्यारहवां भाव बड़े भाई का और छठा भाव कर्ज, शत्रु, नौकरी, एवं बिमारियों का होता है | 

विदेश में शिक्षा इसी भाव से देखी जाती है क्योंकि यह भाव बारहवें भाव से पांचवां है | बारहवां भाव विदेश का और पांचवां भाव शिक्षा का होता है | धन कमाने के लिए जातक का पराक्रम भी इसी भाव से देखा जाता है क्योंकि यह भाव दूसरे भाव से तीसरा है | दूसरा भाव संचित धन का और तीसरा भाव पराक्रम का होता है |